अमेरिका में उबर ड्राइवर के रूप में अपने पहले ही दिन के अनुभव ने एक पत्रकार को देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया. यह अनुभव न केवल आम लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी को सामने लाता है, बल्कि उन नीतियों पर भी सवाल खड़े करता है जो मेहनतकश वर्ग को प्रभावित कर रही हैं. पत्रकार के अनुसार, उनकी सुबह एक राइड अलर्ट से शुरू हुई. उन्होंने राइड स्वीकार की और कुछ ही मिनटों में वर्जीनिया के फेयरफैक्स में एक बुजुर्ग महिला को लेने पहुंचे. महिला ने अपने परिचित से स्पेनिश में कुछ बात की और उनकी कार में बैठ गई. इस छोटी सी राइड से उन्हें 7 डॉलर से भी कम की कमाई हुई. बातचीत के दौरान महिला ने बताया कि वह पेरू की रहने वाली हैं और दो साल पहले उनके पति का निधन हो गया. पहले उनके पति ही उन्हें हर जगह ले जाया करते थे, लेकिन अब उन्हें काम पर जाने के लिए उबर का सहारा लेना पड़ता है.
उबर ड्राइवर के तौर पर यह उनका पहला दिन था और उन्होंने देखा कि अधिकतर यात्री लैटिनो या दक्षिण एशियाई मूल के थे, जो सुबह-सुबह अपने काम पर जा रहे थे. उनके शुरुआती यात्रियों में स्कूल शिक्षक, अस्पताल जाने वाली महिला, किराना दुकान पर काम करने वाली महिला और एक ऑटो मैकेनिक के पास जाने वाला युवक शामिल थे. करीब पांच घंटे के काम में उन्होंने 130 डॉलर कमाए. इस दौरान उन्हें तीन बार शौचालय के लिए जगह तलाशनी पड़ी, जिससे काम की परिस्थितियों की कठिनाई भी सामने आई.
लेखक ने बताया कि उन्हें अपने यात्रियों की इमिग्रेशन स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन उनके मन में एक सवाल बार-बार उठता रहा – क्या उन लोगों को निशाना बनाना उचित है, जो समाज की मूलभूत सेवाएं देते हैं ? यही लोग हमारे लिए नाश्ता बनाते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं, गाड़ियां ठीक करते हैं, होटल साफ करते हैं और बीमारों की सेवा करते हैं. लेखक ने अपने अनुभव के आधार पर अमेरिकी नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन मेहनतकश लोगों को “अमेरिका को महान बनाने” का हिस्सा माना जाता है, फिर भी उन्हें ही सबसे अधिक असुरक्षा का सामना करना पड़ता है. उन्होंने यह भी बताया कि वे 28 वर्षों बाद अमेरिका लौटे हैं. इससे पहले वे कनाडा में रहकर काम कर रहे थे, जहां उनका घर और परिवार था. लेकिन नौकरी छूटने के बाद उन्हें अमेरिका लौटना पड़ा, जहां वे खुद को अब एक अजनबी की तरह महसूस करते हैं.
निष्कर्ष:
यह अनुभव केवल एक उबर ड्राइवर की कहानी नहीं, बल्कि उस वर्ग की झलक है जो हर दिन शहरों को चलाने में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन नीतियों और परिस्थितियों के बीच सबसे ज्यादा संघर्ष भी वही करता है.
