बीकानेर। गहन चिकित्सा इकाई यानी आईसीयू का नाम सुनते ही अधिकांश परिवारों के मन में सबसे पहले डर आता है। पर चिकित्सा की भाषा में आईसीयू का अर्थ “अंतिम अवस्था” नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी है ऐसी व्यवस्था जिसमें मरीज़ की हालत बिगड़ने से पहले ही उसका संकेत पकड़ लिया जाए और तुरंत हस्तक्षेप किया जा सके।
आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर, मेडिकल कॉलेज सर्किल, बीकानेर के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बी. एल. स्वामी बताते हैं कि हार्ट अटैक, गंभीर हार्ट फेल्योर या धड़कन की गंभीर गड़बड़ी के बाद के शुरुआती 48 से 72 घंटे सबसे नाजुक होते हैं। इस अवधि में धड़कन का अचानक बिगड़ना, रक्तचाप गिरना या फेफड़ों में पानी भर जाना जैसी जटिलताएँ बिना किसी चेतावनी के सामने आ सकती हैं।
“सामान्य वार्ड में इन बदलावों को समय पर पकड़ पाना कठिन होता है,” डॉ. स्वामी कहते हैं। “आईसीयू की पूरी व्यवस्था इसी एक काम के लिए बनी होती है-कि कुछ बिगड़े, उससे पहले पता चल जाए।”
वार्ड और आईसीयू में अंतर क्या है
सामान्य वार्ड में मरीज़ के मापदंड दिन में कुछ बार जाँचे जाते हैं। आईसीयू में यह जॉच रुकती ही नहीं। मरीज़ को मल्टी-पैरामीटर मॉनिटर से जोड़ा जाता है, जिस पर धड़कन की गति और लय, रक्तचाप, ऑक्सीजन का स्तर और सॉस की गति हर क्षण दर्ज होती रहती है। आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर की क्रिटिकल केयर इकाई में यही जानकारी एक साथ नर्सिंग स्टेशन के सेंट्रल मॉनिटर पर भी दिखती है, इसलिए रात के समय भी कोई बदलाव नज़र से नहीं चूकता।
इकाई में डिफिब्रिलेटर तत्काल पहुँच में रखा जाता है, क्योंकि धड़कन बिगड़ने की स्थिति में जीवन और मृत्यु का अंतर सेकंडों का होता है। बहुत धीमी धड़कन या हार्ट ब्लॉक की स्थिति में अस्थायी पेसिंग की व्यवस्था की जाती है। जीवनरक्षक दवाएँ सिरिंज और इन्फ्यूजन पंप के माध्यम से दी जाती हैं, जहाँ मात्रा का अंतर माइक्रोग्राम में मापा जाता है- इतनी सटीकता हाथ से संभव नहीं होती।
डॉ. स्वामी के अनुसार निर्णय अनुमान पर नहीं लिए जाते। ईसीजी, इकोकार्डियोग्राफी और कार्डियक मार्कर जाँच की रिपोर्ट के आधार पर ही उपवार की दिशा तय होती है, और आवश्यकता पड़ने पर यह जॉच दिन में कई बार दोहराई जाती है।
वेंटिलेटर को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति
आईसीयू से जुडी सबसे आम गलत फहमी वेंटिलेटर को लेकर है। कई परिवार यह सुनते ही मान लेते हैं कि अब कोई उम्मीद नहीं बची।
“यह धारणा गलत है,” डॉ. स्वामी स्पष्ट करते हैं। “वेंटिलेटर एक सहायक मशीन है, जो तब तक साँस लेने का काम संभालती है जब तक फेफड़े और हृदय अपनी स्थिति सुधार न लें।”
गंभीर हार्ट फेल्योर या फेफड़ों में पानी भरने की स्थिति में मरीज़ की सारी ऊर्जा केवल साँस लेने के संघर्ष में खर्च होने लगती है। वेंटिलेटर यह बोझ अपने ऊपर ले लेता है, जिससे शरीर की ताकत ठीक होने में लग पाती है। हालत सुधरने पर मरीज़ को धीरे-धीर इस सहारे से हटाया जाता है, जिसे चिकित्सा भाषा में वीनिंग कहा जाता है।
डॉ. स्वामी बताते हैं कि आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर की आईसीयू में समय पर वेंटिलेटर सपोर्ट पाने वाले अनेक मरीज़ पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
टीम – उपकरणों से ज़्यादा महत्वपूर्ण
आईसीयू को अच्छा उसके उपकरण नहीं, उन्हें चलाने वाली टीम बनाती है। आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर की क्रिटिकल केयर इकाई डॉ. बी. एल. स्वामी के मार्गदर्शन में कार्य करती है, जहाँ चौबीसों घंटे रेजिडेंट चिकित्सक मौजूद रहते हैं और प्रशिक्षित क्रिटिकल केयर नर्सिंग टीम शिफ्ट में निरंतर सेवाएँ देती है।
नर्सिंग की भूमिका सबसे कम समझी जाती है और सबसे निर्णायक होती है। इलाज की योजना चिकित्सक बनाते हैं, लेकिन उसे घंटे-दर-घंटे ज़मीन पर उतारती है नर्सिंग टीम धड़कन की लय में बदलाव पहचानना, वेंटिलेटर पर मरीज़ की देखभाल, दवाओं का सही संचालन, बेडसोर से बचाव, और हालत बिगड़ने से पहले उसके शुरुआती संकेत पकड़ लेना। इसी कारण गहन चिकित्सा में नर्स-मरीज़ अनुपात सामान्य वार्ड से कहीं कम रखा जाता है और हर शिफ्ट बदलने पर व्यवस्थित हैंडओवर किया जाता है, ताकि मरीज़ से जुड़ी कोई जानकारी छूटे नहीं।
एक मरीज़, कई विशेषज्ञ
गंभीर हृदय रोगी अक्सर केवल हृदय रोग से पीड़ित नहीं होता। शुगर, किडनी की कमज़ोरी, फेफड़ों का संक्रमण और लकवे का खतरा प्रायः साथ-साथ चलते हैं, और आईसीयू में इनमें से कोई भी स्थिति तेज़ी से बिगड़ सकती है।
इसी को देखते हुए आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर में भर्ती मरीज़ों के लिए अन्य विभागों के विशेषज्ञों की ऑन-कॉल परामर्श व्यवस्था रखी गई है- आवश्यकता पड़ने पर फिजिशियन, नेफ्रोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, चेस्ट विशेषज्ञ या सर्जन मरीज़ के बेड पर आकर परीक्षण करते हैं। डॉ. स्वामी के अनुसार इससे निर्णय तेज़ होते हैं और परिजनों को गंभीर अवस्था में मरीज़ को दूसरी जगह शिफ्ट करने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता।
संक्रमण – बीमारी के बाद दूसरा बड़ा खतरा
गहन चिकित्सा में मरीज़ की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, और बाहर से आया मामूली संक्रमण भी उसके लिए भारी पड़ सकता है। इसी कारण आईसीयू में हैंड हाइजीन, स्टेराइल तरीके से लाइन लगाना और ड्रेसिंग, वेंटिलेटर से होने वाले निमोनिया की रोकथाम, बायोमेडिकल कचरे का अलग निस्तारण और यूनिट की नियमित कीटाणुशोधन जैसे नियम सख़्ती से लागू किए जाते हैं। NABH मान्यता प्राप्त अस्पताल में यह पूरी प्रक्रिया लिखित प्रोटोकॉल के तहत होती है।
परिजनों का प्रवेश सीमित रखना भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। “यह कठोरता नहीं, मरीज़ की सुरक्षा है,” डॉ. स्वामी कहते हैं। परिजनों से अपेक्षा की जाती है कि वे मिलने जाते समय हाथ साफ़ करें, स्वयं बीमार होने पर अंदर न जाएँ और बाहर का खाना इकाई में न ले जाएँ।
परिजनों को क्या पूछना चाहिए
आईसीयू के बाहर बिताया गया समय परिवार के लिए सबसे कठिन होता है, और घबराहट में अक्सर सही सवाल पूछे ही नहीं जाते। डॉ. स्वामी सलाह देते हैं कि परिजन रोज़ाना कम से कम इतना ज़रूर पूछें –
आज मरीज़ की स्थिति कल की तुलना में बेहतर है या नहीं, और किस आधार पर
इस समय कौन-सा उपचार चल रहा है और उसका उद्देश्य क्या है
आगे क्या जटिलता आ सकती है और उसके संकेत क्या होंगे
अनुमानित खर्च कितना रहेगा, और कौन-सी बड़ी प्रक्रिया प्रस्तावित है
समझ में न आए तो दोबारा पूछने में संकोच नहीं करना चाहिए। मरीज़ की पुरानी पर्चियाँ, पिछली रिपोर्टें और एलर्जी की जानकारी साथ रखना भी उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि यह जानकारी इलाज की दिशा सीधे प्रभावित करती है।
क्षेत्र के लिए इसका अर्थ
पश्चिमी राजस्थान के अनेक ज़िलों में कुछ वर्ष पहले तक गंभीर हृदय रोगियों के लिए नज़दीकी उन्नत सुविधा कई घंटों की दूरी पर थी, और यही दूरी अक्सर गोल्डन ऑवर को निगल जाती थी। आयुष्मान हार्ट केयर सेंटर में पिछले छह वर्षों से 24 घंटे कार्डियक इमरजेंसी एवं क्रिटिकल केयर सेवा संचालित है, जिसमें अब तक 1200 से अधिक गंभीर मरीज़ों का उपचार किया जा चुका है।
“क्रिटिकल केयर में सबसे बड़ी उपलब्धि कोई मशीन नहीं होती,” डॉ. स्वामी कहते हैं, “बचाया गया समय होता है- क्योंकि हृदय की जो मांसपेशी नष्ट हो जाती है, वह लौटती नहीं।”
